अध्याय 199 - अंतिम सहारा

मार्गोट का नज़रिया

मैं धीरे-धीरे जागी।

एकदम से नहीं – टुकड़ों में।

सबसे पहले आई गर्माहट।

ऊपर तक तनी हुई रज़ाई का नरम वजन, जो मुझे यूँ लपेटे हुए था जैसे किसी सुकून भरे कोकून में हूँ। ऐसा एहसास मुझे कई दिनों से नहीं हुआ था। फिर आई ख़ामोशी। वो डरावनी, खोखली नहीं, जिसकी मैं इस जगह पर आदी हो चुकी थी…...

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